यारों कि टोली होती थी, हर शाम निराली होती थी I
रोज़ एक नयी मोहब्बत, हर रात मुस्कुराती होती थी I
मेरे ज़हन में हर पल, इक नया सपना पलता था I
खुश रहता था सारा आलम, कभी मैं भी हँसा करता था ! II
दोस्तों के साथ रंगीन दिन , शामें खुशियों भरी होती थी I
हर दिन जैसे थी होली ,हर रात दीवाली होती थी. I
हर हँसी के साथ एक जहाँ नया सा दिखता था II
खुश रहता था सारा आलम, कभी मैं भी हसा करता था II
वो बारीशो का मौसम , हर तराना नया सा होता था I
बारिश-बूँदो की धून जिस मे, हर दिल झूमा करता था I
जाने कितने दिन बीते ऐसे ,हर दिन नया सा लगता था I
खुश रहता था सारा आलम, कभी मैं भी हसा करता था II
आसमाँ जब बाहें फैलाए, अपनी तरफ बुलाता था I
सागर की लहरों से मिलने, मन पगला भागा करता था I
खुशियाँ इतनी पाई है , और खुशियाँ बाँटा करता था I
खुश रहता था सारा आलम, कभी मैं भी हसा करता था II
आज भी मैं हसा करता हू ,
पर हँसने मे वो बात नही I
पहले जो पल पल साथ ही थे ,
वो सारे अब साथ नही ....I
याद करता हू पल पल सारे , आज भी हसा करता हू ...
जैसे मैं हसा करता था , जैसा "कभी" हसा करता था II
केदार - १८/०९/२००९
10 comments:
Yes dude..........me also missing those Happy days .
Great poem yaar.......
just too good kedar......
missing those golden days....
sahi hai yaar sahime woh purane din woh purani baate.....
kafi achhi rachna hai. apne choota kise gamgin nahi kar deta. sadhuwad.
kya baat hai....
mi sahasa hindi wachat nahi.... pan tu lihilela mala mana pasun awadala....
:) :) :)
Keep it up bro !!!
:).... so, it feels like Target achieved for you...Gr8!!!!
Cheers bro!!
wa...wa...bahot khub :)
hey jus found u on orkut..
nice poem
hardly know CA ppl to b ds creative :P
bahot badhiya sir..................
आज भी हँसलो दिलसे किसने तुम्हे रोका है
जिंदगी दो पल कि है, खुदा की ये अमानत है
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