Tuesday, 25 June 2013

कुछ अरसे हो गए ...

बेहती हवा से, तुम्हारा लटों में उलझना याद आया ....
कुछ अरसे हो गए ये उलझने सुलझाए हुए !!

याद होगा तुम्हे वो "हमारा" सपनो वाला घर बनाना ...
कुछ अरसे हो गए यादो को इस आशियाँ में आए हुए !!

बारिश की उन बूंदों को अब  भी नहीं भुला हूँ मैं ....
कुछ अरसे हो गए हैं जिनमे मन को भिगाए हुए !!

नहाके, अपने बालोको निहारती तुम गुडिया जैसी ...
कुछ अरसे हो गए उस भीनी खुशबु को भुलाए हुए !!

अब अक्सर यादे ही  करती हैं लड़ाईयाँ मुझसे .....
कुछ अरसे हो गए प्रीतम तुमसे बात मनवाए हुए  !!

यादो का क्या हैं वो तो है पल भर की ...
कुछ अरसे हो गए हैं इन सब यादो को भी अब याद आए हुए !! ........ केदार २४ जुन २०१३!!

5 comments:

dr.amol said...

Apratim.....

शुभ्र ज्योत्स्ना said...

mast....yandachya pavsat avdleli kavita... :)

Anike A. said...

Wa!! Refreshed by reading this!!

Parag said...

Good one.

Unknown said...

फार छान ................सुन्दर आणि अर्थपूर्ण आहे...........