Monday, 24 May 2010

मेरी परछाई ...

जैसे  ही  इस जग में आया ...
हाथो  में जो तोहफा पाया ..
तोहफा नहीं सहेली थी ..
वो मेरी परछाई थी ... !!

नन्हा बचपन.. खेला आंगन में ..
हर इक चीज़ थी नई  जेहेन में ..
किन्तु वो  जानी पेह्चानी थी ..
वो मेरी परछाई थी ... !!

बचपन छुटा खिलौने छूटे ..
नई दिशाएं .. कुछ रिश्ते अनूठे ..
पर गुमसुम सी इक कोने में थी ..
वो मेरी परछाई थी ... !!

जादू चला संसार का ऐसा ....
और भूल गया था होना जिसका ...
हर सुख दुःख में साथी थी ...
वो मेरी परछाई  थी ... !!

अब लोग भी बिछडे .. अपने भी बिछडे..
यादों के सहारे हैं .दिल के दुखड़े ..
दिल कराहा और रो कर बोला .. माया सब पराई थी ..
अपनी थी बस एक ही "दौलत"   वो मेरी  परछाई  थी  !!

फिर हंसके  बोली धीरे से ..

अरे पगले क्यों रोता है ?
अपनों से कोई दूर होता है ??
कल भी थी आज भी हूँ ,तुने यादें भुला दी थी ...
फिर दोनों बातें करते रहे .. ऐसी मेरी परछाई थी !!

                                                     केदार .... २४ में २०१०

7 comments:

Priyanka said...

2 gud :)
keep writing...cz it's whr u express urslf bst !!

Sapana said...

khup sunder...

amruta said...

nice one :)

Janpune said...

दिल कराहा और रो कर बोला .. माया सब पराई थी ..
अपनी थी बस एक ही "दौलत" वो मेरी परछाई थी !!

mastach ... !!!

Pallavi Joshi said...

Its too good

शुभ्र ज्योत्स्ना said...

hi kavita vachun shalet astanachi deewali, nanhi chidiya ya hindichya pustakatlya kavita athavlya..bhasha chan vaprlis ani vicharahi...mast

Ranjeet Paradkar said...

good one!